Pancham Prasad


  मेरी पढाई मेरा हथियार  

Now a day’s children give up early in front of the circumstances and stop working hard. Become a part of the crowd of unsuccessful people. But there are some such examples which inspire us to fight with the circumstances and move forward in life. 

This story is about one such person who came out of a small village of Uttar Pradesh and won all his adverse situations by his hard work and got National Award from former Prime Minister of India Shri Man Mohan Singh ji. 

Now his story in his own words: My name is Pancham Prasad. I was born in a very poor family in Sikanderpur village of Chakia Tehsil of Chandauli district, Uttar Pradesh. I am the eldest of my five brothers and two sisters. Agriculture was the only support for the maintenance of the family, in that too there were not enough means of irrigation, farming was done with the help of nature, and sometimes there was a drought. The upbringing of family of seven children was a big challenge for my father, I always used to think about studies. Somehow, I completed my studies up to the fifth standard in my own village. But my father flatly refused for further studies. At the same time there was a test of 200 marks with all the nearby school children, in which I got 196 marks. From there the eyes of the teachers fell on me and they encouraged me to continue further studies and also assured that with the help of donations, you will study further. In class 8, I was the only student who passed with first class; also I taught two daughters of the teacher and they passed with second class. A wave of happiness ran in the village school. 

When my father was expecting financial help in running the household and physical help in the farm work, I was busy building my future on my studies. Father had clearly refused for further studies but my guru ji Shri Bhagwati Pandey ji came forward to help and he himself took me to Government Inter College Chakia which is 5 km away from my  village on his bicycle and asked the principal about my condition. By this, the entire fee of 4 years was waived. Due to the insistence of my studies, the distance between my father and me increased a bit and he stopped speaking to me. But my mother, who loved me immensely, supported me in every decision and always inspired me to move forward. Even my revered Guruji did not leave my side. I will always be especially indebted to my mother and revered Guruji. At the same time I promised myself that I would study further and become an engineer or a doctor and one day I would definitely change the condition of my family. Financial constraints were stopping me from moving forward but I was still completely firm towards my goal. I worked as a wage worker for ₹ 1 per day to meet the need of money and also started loading and unloading of goods on trucks. In this way, after hard work for 4 years, I passed the examination in intermediate school with first division also. 

My life rides like a remote ride, from home to wrestling  field, from field to ground, then school was just my life cycle, apart from this Kabaddi, running, high jump, long jump, and exercise, which was my life's hobby, was also fulfilling them little by little. Due to lack of money, I could not even buy kerosene oil for my studies and often completed my studies in moonlit nights. After 12th, suddenly my father's health became very bad, due to growing up, all the responsibility of the house came on me and I had to leave my studies and took care of farming. Immediately after his father's recovery, with the help of a friend from my village, I took admission in ITI  in Banaras. There too I informed everyone about my financial condition, so that there also I got ₹ 40 per month as scholarship support for 2 years. I passed ITI in 1984 with 81%. I was progressing towards my goal but again I could not take admission in engineering due to financial constraints and I started working in a workshop in Mughalsarai 32 km away from my village and later I joined apprentice in 1985 in Hindalco Sonbhadra. As a reward for years of hard work, I got selection in technician in NTPC Singrauli on 26th December 1986, after 10 years my father started speaking to me. It was the end of one of my struggle eras, but now I have become used to working hard. While working in NTPC, I considered work more than myself, I got all that I had never imagined.

 In the year 2000, I was honored with the Manohar Lal Malik Award, the highest award of NTPC Singrauli and in 2004 received the National Honor Shram Veer Award by the Hands of the Prime Minister of the country, Dr. Manmohan Singh. Apart from this, playing a key role in Universal Quality Circle, represented India in Japan with the team in 2011 and also brought up NTPC's name with him. Because there is no age to learn, so I continued my studies, did Diploma in Power Engineering in 2009 with 75% marks and joined NTPC Vindhyachal on 26 December 2014 as Engineer and retired on July 2022 as Assistant Manager. I have a daughter who is PGDM from Marketing HR, two sons, elder son is working as manager in SBI and younger son is currently preparing for his job. At present, I have made my permanent residence in Sonbhadra district and will do social service by staying there. In the end, I bow to my Gurudev, whose inspiration and guidance helped me reach this stage, as well as indebted and grateful to my parents, whose cooperation and blessings made my life successful in this form.  

आजकल के बच्चे परिस्थितियों के आगे जल्दी हार मान जाते है और मेहनत  करना ही छोड़ देते है। असफल लोगो की भीड़ का हिस्सा बन जाते है। परन्तु कुछ ऐसे भी उदाहरण है जो हमें परिस्थियों से लड़कर जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते है।  यह कहानी एक ऐसे ही पुरुष की है जिसने उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव  से निकल कर अपनी मेहनत से अपनी सभी प्रतिकूल परिस्थितियों को जीतकर भारत के पूर्व प्रधान मंत्री श्री मन मोहन सिंह जी से राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया है।  

अब उनकी कहानी उन्ही के शब्दो में:- मेरा नाम पंचम प्रसाद है।  मेरा जन्म चंदौली जिले चकिया तहसील के उत्तर प्रदेश के सिकंदरपुर गांव में बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। मैं अपने पांच भाइयो में सबसे बड़ा हूँ तथा दो बहने हैं । कृषि एकमात्र परिवार के भरण पोषण का सहारा था, उसमें भी सिंचाई के पर्याप्त साधन नहीं थे , प्रकृति के सहारे ही खेती होती थी कभी कभी सूखा भी पड़ जाता था। सात बच्चो के इस मेरे परिवार का लालन पालन ही मेरे पिताजी के लिए एक बड़ी चुनौती थी  मैं हमेशा पढाई के बारे में सोचता रहता था।  मैंने जैसे तैसे करके अपने ही गांव में पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई पूरी कर ली। लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए पिताजी ने साफ़ मना कर दिया।  उसी समय अचानक आस पास की सभी विद्यालय के बच्चों के साथ 200 नंबर का एक टेस्ट हुआ, जिसमें मैंने 196 अंक प्राप्त किए।  वहीं से अध्यापकों की नजर मेरे ऊपर पड़ गई और उन्होंने आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए मुझे उत्साहित किया और भरोसा भी दिलाया कि चंदे के सहयोग तुझे आगे पढ़ायेंगे। कक्षा 8 में, मैं  एक मात्र विद्यार्थी था जो कि प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुआ,  साथ ही  मैंने अध्यापक की दो बच्चियों को भी  पढ़ा कर द्वितीय  श्रेणी से उत्तीर्ण कराया। गांव के विद्यालय में खुशी की लहर दौड़ गई।  

 जब मेरे पिताजी घर चलाने में आर्थिक और खेत के काम में शारीरिक मदद की उम्मीद कर रहे थे तब मैं  अपने और पढाई के दम पर अपना भविस्य बनाने में लगा था।  आगे की  पढ़ाई के लिए पिताजी ने साफ  मना कर दिया था परंतु मेरे गुरु जी श्री भगवती पांडे जी मदद के लिए आगे आए तथा उन्होंने स्वयं अपनी साइकिल पर बिठाकर गांव से 5 किलोमीटर दूर राजकीय इंटर कॉलेज चकिया ले गए तथा प्रिंसिपल से मेरी श्थिति के बारे में बता कर 4 वर्ष की पूरी फीस माफ करा दी।  मेरी पढाई की जिद से मेरे पिताजी और मेरे बीच की दूरिया कुछ और बढ़ गयी और उन्होंने मेरे से बोल चाल बंद कर दी।  किंतु मेरी मां जो की मेरे से असीम प्रेम करती थी, ने मेरे हर एक फैसले में मेरा साथ दिया और सदैव आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।  मेरे पूजनीय गुरु जी ने भी मेरा साथ नहीं छोड़ा। मैं खासतौर से अपनी मां तथा पूजनीय गुरूजी का सदैव ऋणी रहूंगा। मैंने उसी वक्त अपने आपसे  यह वादा किया कि मैं आगे पढ़ लिखकर इंजीनियर या डॉक्टर बनूंगा और एक दिन अवश्य ही अपने परिवार की दशा बदलूंगा ।  

आर्थिक तंगी मुझे फिर आगे बढ़ने से रोक रही थी लेकिन मैं अभी भी अपने लक्ष्य के लिए पूरी तरह अडिग था  मैंने पैसे की जरूरत को पूरा करने के लिए ₹1 प्रतिदिन में  मजदूरी का कार्य किया तथा ट्रकों पर सामान की लोडिंग  अनलोडिंग का काम भी शुरू कर दिया। इस तरह 4 वर्ष तक कठोर मेहनत  के बाद मैंने  इंटरमीडिएट विद्यालय में भी  प्रथम श्रेणी से परीक्षा पास की।  

 मेरी जिंदगी सवारी मानो जैसे रेमोट से चल रही हो।  घर से खेत, खेत से अखाड़े में कुश्ती,  फिर विद्यालय बस  यही मेरा जीवन चक्र था,  इसके अलावा   कबड्डी, दौड़, हाई जंप, लोंग जंप, तथा कसरत, जो कि मेरी जिंदगी का शौक था उनको भी थोड़ा थोड़ा पूरा कर रहा था।  पैसे के अभाव में,  पढ़ाई के लिए मैं केरोसिन तेल भी खरीद नहीं पता था और अक्सर चांदनी रात में अपनी पढ़ाई पूरी करता था। 12वीं के बाद अचानक पिताजी की तबीयत बहुत खराब हो गई  बड़ा होने की वजह से घर के सारी  जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गयी और मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी  मुझे अपने सारे  सपने धूमिल होते दिखे लेकिन जिम्मेदारी छोड़कर भी तो भाग नहीं सकता था इसलिए मैं 2 वर्ष तक खेती का कार्य संभालता रहा।  पिताजी के स्वस्थ हो जाने पर  तुरंत अपने गांव  के  ही एक मित्र की मदद से बनारस में आईआईटी में दाखिला ले लिया।   वहां भी मैंने अपनी आर्थिक  स्थिति से सभी को अवगत कराया जिससे वहां भी मुझे ₹40 प्रतिमाह 2 वर्ष के लिए स्कॉलरशिप सहयोग राशि के रूप में मिल गया।   मैंने 1984 में 81% से आईटीआई की परीक्षा उत्तीर्ण की।  मैं अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ ही रहा था लेकिन फिर आर्थिक तंगी के कारण इंजीनियरिंग  में प्रवेश नहीं ले सका और मैंने अपने गांव से 32 किलोमीटर दूर मुगलसराय में एक वर्कशॉप में काम करना शुरू कर दिया और 1985 में हिंडाल्को सोनभद्र में अप्रेंटिस में प्रवेश ले लिया।  वर्षो के मेहनत के प्रतिफल के रूप में 26 दिसंबर 1986  में एनटीपीसी सिंगरौली में टेक्नीशियन में सलेक्शन मिला, तब  जाकर 10 वर्षों बाद  मेरे पिताजी ने मुझसे बोलना शुरू किया। यह मेरे एक संघर्ष युग का समापन तो था लेकिन अब मुझे मेहनत  करने की जैसे आदत सी हो गयी थी।   NTPC में कार्य करते हुए मैंने काम को खुद से भी बढ़कर माना,  प्रतिफल मैं मुझे वो सब मिला जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी सन 2000 में एनटीपीसी सिंगरौली का सर्वोच्च पुरस्कार, मनोहर लाल मलिक अवार्ड से मुझे सम्मानित किया गया तथा सन् 2004 में देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी के कर कमलों द्वारा राष्ट्रीय सम्मान श्रम वीर पुरस्कार प्राप्त किया। इसके अलावा  यूनिवर्सल क्वॉलिटी सर्किल में अहम भागीदारी निभाते हुए 2011 में टीम के साथ जापान में भारत का प्रतिनिधित्व किया और अपने साथ NTPC का भी नाम रोशन किया। 

क्योंकि सिखने की कोई उम्र नहीं होती इसलिए मैंने अपनी पढाई जारी रखी,  सन 2009 में पावर इंजीनियरिंग से 75% अंक के साथ डिप्लोमा किया तथा 26 दिसंबर 2014 में एनटीपीसी विंध्याचल में इंजीनियर के पद पर ज्वाइन किया और जुलाई 2022 को असिस्टेंट मैनेजर पद पर सेवानिवृत्त हो रहा हूँ मेरे पास एक बेटी है जो मार्केटिंग एचआर से पीजीडीएम की है,  दो बेटे हैं बड़ा बेटा एसबीआई में मैनेजर पद पर कार्यरत है और छोटा बेटा अभी अपनी जॉब के लिए तैयारी कर रहा है।  मैंने  वर्तमान में जिला सोनभद्र में से अपना स्थाई निवास बनाया है और वहीं पर रहकर समाज सेवा करूंगा अंत में मैं अपने गुरुदेव को शत-शत नमन करता हूं जिनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन वह सहयोग से मैं इस मुकाम तक पहुंच पाया साथ ही परम पूज्य अपने माता पिता का ऋणी और आभारी हूं जिनके सहयोग और आशीर्वाद से मेरा जीवन इस रूप में सफल हुआ।