Short Stories



  Dilli Chalo  

  Sukanya Roy         2020-12-01 01:47:37

A famous slogan,  “Dilli Chalo”,  by Netaji Subhas Chandra Bose comes to my mind today. I read this slogan in my early childhood schooldays. But never  thought that In the year 2020  farmers will have to  follow the path of Netaji to fight for  their rights.  India has  always been  known as an agricultural economy.  Farmers are the  backbone of our nation. “Jai Jawan, Jai Kisan“ is not only a  slogan, but it is an integral part of our nation. In  the election season “farmers’ benefits” always become the integral part of political campaigns, but once elections are  over, these become irrelevant. Recently the  Central Government passed a bizarre law for farmers with the avowed object to benefit them, but  unfortunately the enacted law is  for their detriment.  Farmers are against this law. They want its rollback. So in the current days “Jai Jawan, Jai Kisan” slogan has become  meaningless. The farmers have no choice except to follow the words of Neta Subhas Chandra Bose.  “Dilli Chalo”  (March to Delhi.) 

-*-*-*-*-

Latest


The Blackbox - A inspirational story

A good consultant, have to be a good story-teller. I feel you become a storyteller when you start making your own stories, so that you can explain the point of view in better way. I started writing stories while practicing storytelling and found that story writing is so powerful and it helps bring our imagination into reality. Here I am sharing a story of the BlackBox, a character that inspire me the most, and will inspire you too.

Let’s start the story with my friend Sreedhar, the youngest and a pampered kid from childhood, grew up in the small town of Uttarakhand (India). He was considered the brightest child in his school, and managed to get into the premier engineering institute of India for graduation.

Sreedhar and I used to enjoy attending English lectures in standing positions if not thrown out of the class. This brought us closer, and he always gave me pride that my English is better than at least one person. The brightest kid of school time was somehow lost in college. He generally kept quiet, and year on year was accumulating courses to be cleared. He used to bunk most of the classes but was famous for two things. One was smoking, he had wrapped walls of his hostel room with stacks of cigarette boxes, and the second is black screen shell programming in Unix.

He painted the room black, and most of the time we saw his lips sucking cigarettes and his fingers dancing on the keyboard. Everyone else from the computer branch was called Box (“Dabba” in Hindi) but he got the title BlackBox, who was always in search to solve the mystery of college computer networks, specially when our hostel network crashed. Just like BlackBox in aircraft keeps the record of all the flight data that is useful in troubleshooting emergencies.

Final year came, and most of us were busy preparing for campus interviews or celebrating selections, while few still had courage to go for higher studies. He was in none of them.

He used to tell me “I do things that add value to me”.
I was not sure of the value but I was sure that the number of subjects he had accumulated to clear will keep him busy for next few years. The final year passed away so quickly, we landed up in the corporate world, and left the Blackbox in his own created lost world, a black room full of cigarettes, cables and a PC.

Two years later, we got together on convocation, the blackbox was still there, playing with cables and the camera’s placed in the convocation hall. It was nothing less than magic to see him controlling all the cameras from his room at that time. He smiled after looking at my degree and said I will not find him there. He was indicating that he wasn’t there for this piece of paper. 

I did not give much attention then and left college as a proud engineer. Years passed on, we all settled in our daily life, trying to face every problem of life in the name of agility and transformation. I was at one of the biggest conferences in the Java world in the US, to present how we can automate Java migrations (a hot topic in those days). I was excited for my first talk on such a big platform but 5 minutes before the start I realized some hiccups in the network between my standard laptop and some advanced Audio/Visual system from some BeeBee company.

Unknowingly I said “Where is the BlackBox?”, a fellow next to me given some surprising look. I was thinking about the BlackBox at that moment who used to help us in such situations. A minute later, a person wearing a BeeBee T-shirt came to me asking my consent to apply a patch on my PC from their handheld device, and I had no reason to say no. It was magic, the issue is fixed before I could raise it. The BeeBee person handed me a card. I noticed that BeeBee logo was all over, from entry, id-cards, stalls/showcases, exits, and all was automated. I turned the card and I see BeeBee means “BlackBox”.

Quickly I finished my talks, started searching on yahoo! (popular search engine at that time) about BeeBee, and come to know that it is a company that produces and manages advanced A/V systems for large-scale events. I noticed a person called me from behind, holding a BeeBee tracker, I turned and guess what! I found the BlackBox again, founder of BeeBee Mr. Sridhar Kodian, holding 50 patents in the area of network and wireless communication.

And, I understood what he meant when he used to say “He does the thing that adds value”.

https://thinkuldeep.com/post/story-blackbox/
Read More
-*-*-*-

जुबानी घाव

पहला जुबानी बाण
एक सहेली दूसरी सहेली से-  तुम्हारे बच्चा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?

सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं!

 बस फिर क्या था , सहेली के दो प्रश्न और उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? 
क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?

लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।

थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।। 
फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।
मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।

जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।

दूसरा जुबानी बाण
रवि ने अपने जिगरी दोस्त आकाश से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?
आकाश- मारुति के शोरूम में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक?
आकाश-18 हजार।।
रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ?
आकाश- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।

मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद आकाश अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। आकाश ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।

तीसरा जुबानी बाण
एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही? बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।।

पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।

इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।।

याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।।

जैसे-
तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।
तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।
तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।।
Read More
-*-*-*-

मंत्रों की शक्ति या आयुर्वेद का चमत्कार

सत्य घटना
बात करीब दस बारह वर्ष पुरानी है।गर्मियों का समय था ।एक जीप कालबा बस स्टॉप पर आकर पानी पीने के लिए रुकी । जीप में तीन व्यक्ति और एक 16-17 वर्षीय लड़का अधमरा लेटा हुआ था ।गांव के एक व्यक्ति ने जिज्ञासावश पूछ लिया भाई बच्चे को क्या हो गया। तो उनमें से एक व्यक्ति जिसकी आंखे रोने के कारण सुजी हुई थी ,ने कहा भाई ये मेरा बेटा है इसको खेत में काले सांप ने काट लिया ।परसो हम इसको एसएमएस अस्पताल जयपुर लेकर गए थे लेकिन डाक्टरों ने जवाब दे दिया है अब जवान बेटे को मरते हुए देखने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।
गांव के व्यक्ति ने उसे एक बार मेरे दादा जी श्री रघुवीर योगी से मिलने का सुझाव दिया और उसको आश्वस्त किया कि वो इसे ठीक कर देंगे ।हमारे गांव में सांप काटे का वही उपचार करते है । बच्चे के पिता जी को विश्वास नहीं हुआ परन्तु मरता क्या ना करता ।उसने जीप का मुंह हमारे गांव की तरफ कर दिया और हमारे घर आकर रुके । दादा जी ने बच्चे की नाडी देखकर कहा कि जहर समस्त शरीर में फैल चुका है परन्तु कोशिश करते हैं ।
आप अपने गांव किशनपुरा चलो मै पीछे पीछे अपने गारड़ी ( सांप का झाड़ा लगाने वाले) लेकर आता हूं । 
खैर बाबा ने बिना देर किए बच्चे के गांव पहुंचकर उपचार शुरू किया । मंत्रो के साथ साथ आयुर्वेद दवा दी और बच्चा तीन दिन में बिलकुल स्वस्थ हो गया ।
जिस बच्चे के इलाज के लिए बड़े हॉस्पिटल ने हाथ खड़े कर दिए उसका इलाज मेरे दादा जी ने आयुर्वेद की शक्ति से ठीक कर दिया ।
कुछ लोग इसे अंधविश्वास कह सकते हैं मै भी ऐसा ही मानता था ।एक दिन मैंने दादा जी से कहा बाबा ये जो आप सांप झाड़ते हो क्या सच में ही मंत्रो से जहर उत्तर जाता है ।तब वो बोले बेटा जहर तो मै जो ये काली पाड, बांझ काकेडा, और काली मिर्च देशी घी देता हूं उससे भी कम हो जाता है परन्तु मंत्र मरीज पर मनोवैज्ञानिक असर करते हैं ।रोगी का भय दूर करते हैं । उनकी बात से सहमत होकर मैंने सारे मंत्र एक नोट बुक में लिख लिए ।
ये कोई कहानी नहीं है अपितु वास्तविकता है । कोई भी व्यक्ति मेरे गांव में आकर तसल्ली कर सकता है। अब दादा जी तो नहीं रहे परन्तु उनके सिखाए कुछ नुक्से मेरे पास भी हैं। जिनमे स्वेत्त प्रदर और पैरदारी का शत प्रतिशत इलाज मै तीन खुराकों में कर सकता हूं ।
 
               जय आर्यवर्त । जय आयुर्वेद ।
Read More
-*-*-*-

पिता की जंग

खर्चा बहुत ज्यादा था और दुकान जवाब दे रही थी | जिस दुकान पर रोज ₹2000 की बचत होती थी,  वह दुकान  अब ₹200 की बचत भी नहीं दे पा रही थी |  बड़ी कंपनियां हमेशा छोटे दुकानदारों का नुकसान तो करती ही है,  पर एक सब्जी वाले का घर इस तरह से मदर डेयरी बर्बाद कर देगी यह सब्जी वाले ने सोचा नहीं होगा | 
 जब दो बेटे इंजीनियरिंग कर रहे हो और उस समय दुकान भी बंद हो जाए तब उस पिता पर क्या बीत रही होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है | घर का खर्च कैसे चल रहा था, और इंजीनियरिंग की फीस के पैसे कैसे भेजे जा  रहे थे यह वह पिता ही जानता था |  लेकिन इस पिता ने मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति में भी कभी हार नहीं मानी,  वह आज इस मदर डेरी से कैसे हार मान सकता था ,  और इस हार पर तो उसके बच्चों का पूरा भविष्य टिका हुआ था  | 
क्या सही है और क्या गलत  ! यह सोचे बिना , यह सब्जी वाला अपनी 25 साल पुरानी रेडी से एक पक्की दुकान वाले मदर डेयरी से कंपटीशन करने चल पड़ा | 

वह रोज सुबह जाकर मदर डेयरी के बोर्ड पर लिखे हुए भाव पढ़कर तो आता था, लेकिन वह खुद तो मंडी से भी इतना सस्ता सामान नहीं ला पा रहा था | 
अब उसके पास एक ही रास्ता बचा था ,वह था, आजादपुर मंडी से सब्जियाँ लाना |
55 साल की उम्र में वह मंडी जो कि 40 किलोमीटर दूर थी, जाना बहुत मुश्किल तो था, लेकिन विडंबना यह थी कि नहीं जाने से, मदर डेयरी के भाव पर सब्जी बेचना लगभग असंभव था | 

एक पिता ने 10 साल पहले छोड़ चुके अपने काम को फिर से शुरू किया , रात में 11:00 बजे सोने के बावजूद 2:00 बजे वापस उठकर आजादपुर मंडी जाने लगा |  अपने 25 साल के तजुर्बे का पूरा फायदा उठाया और कुछ ही  दिन में वह मदर डेयरी से सस्ते भाव में सब्जियां बेचने लगा | 

1 महीने की कमाई उसने वापस उसी दुकान में लगाई और नया इलेक्ट्रॉनिक कांटा खरीदा, एक मोबाइल खरीदा और पंपलेट भी छपवाए | 

फ्री होम डिलीवरी के साथ एक नई शुरुआत की और देखते ही देखते 1 दिन की बिक्री  7000 पर पहुंच गयी | लेकिन तभी मदर डेरी वाले एक नया दांव खेला और रेट बिल्कुल कम कर दिए | 
वह रेट तो कम कर सकता था लेकिन 25 साल का तजुर्बा कहां से लाता,  मदर डेरी वाला  बंसी सब्जी वाले  जैसी  क्वालिटी नहीं दे पाया  और धीरे-धीरे बंसी सब्जी वाले की दुकान ने रफ्तार पकड़ना शुरू किया और लोग लाइन में लगकर सब्जी खरीदने लगे सिर्फ 6 महीने की मेहनत में ही उस सब्जी वाले ने अपनी जंग जीत ली मदर डेयरी वाले ने अपनी दुकान वहां से ले जाकर दूसरी जगह लगा दी| 

हम अक्सर एक छोटी छोटी परेशानी से डर कर भाग जाते हैं और प्रयास करना ही छोड़ देते हैं बिना लड़े ही हार जाते हैं पर क्या बंसी बिना लड़े हार जाता तो अपनी दुकान को कभी चला पाता क्या ? उसके बेटे इंजीनियर बन पाते ?

यह कहानी विद्यार्थियों के लिए ऐसे कई सवाल छोड़ जाती है | 
क्या हम अपनी पूरी मेहनत कर रहे हैं ? क्या हम अपने लक्ष्य पाने की चेष्टा पूरी तरह से कर रहे हैं ?क्या हम कोई बहाना तो नहीं बना रहे ? क्या हम खुद को धोखा नहीं दे रहे?

इन सभी सवालों के जवाब यदि हम सच्चे मन से खुद को दें तो हमें सफल होने से कोई रोक नहीं सकता है........
Read More
-*-*-*-

कागजी टंकी

सरपंच साहब ! ओ..... सरपंच साहब! 
छगन सरपंच साहब के बड़े से मकान के बाहर खड़ा होकर आवाज लगा रहा था कई बार आवाज लगाने के बाद ऊपर बालकनी से एक जवाब मिला, 
"सरपंच साहब तो नहीं है, 2 दिन से कहीं गए हुए हैं,सोमवार को आएंगे तब आना|"
सोमवार को जब  छगन सरपंच के घर पहुचा तब सरपंच साहब बाहर चबूतरे पर बैठकर हुक्का पी रहे थे l

आओ भाई छगन, कैसे आना हुआ - सरपंच ने हुक्के का एक कश पीते हुए कहा |

सरपंच साहब मैं 3 दिन पहले भी आया था, तब सरपंचानी जी ने बोला कि आप कहीं गए हुए हैं|

अरे मैं अपनी बेटी के यहां गया था, समधी जी की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी, कल शाम को ही आया हूं|

 यह सब छोड़ो...तुम बताओ, कैसे आना हुआ, सरपंच में हुक्का छगन के हाथ में पकड़ आते हुए कहा|

साहब मेरे घर के पास जो हैंडपंप है ना, उसका पानी ऐसे ही बहता रहता है और मेरे घर के सामने आकर भर जाता है, उसमें बहुत बदबू  आती है और खूब सारे मच्छर भी हो रखे हैं|

समस्या तो तुम्हारी जायज है,  बताओ मैं कैसे सहायता कर सकता हूं , तुम ही बताओ क्या करवाना है  मैं तो तुम्हारी सेवा के लिए ही हूं | जो बोलोगे, करवा दूंगा|

एक गड्ढा करवा दीजिए ,ढकवा दीजिए, पानी सारा उसी में चला जाएगा|

ठीक है छगन करवा देते हैं ,अपने यहां के वार्ड पंच से एक एप्लीकेशन लिखवा कर ले आओ|

अगले दिन सुबह उठते ही छगन वार्ड पंच के यहां पहुंच गया, 
वार्ड पंच ने मौके का मुआयना किया और एक एप्लीकेशन लिखा | उसने लिखा कि यहां पर एक पक्की टंकी की जरूरत है जो नीचे से खुली होगी  जिससे पानी रिस कर नीचे चला जाएगा |

छगन को बोला- छगन यहां पर पक्की टंकी बनाते हैं, कच्ची टंकी तो बहुत जल्दी टूट जाएगी|

पर देख सरकारी काम है थोड़ा टाइम लगेगा, पर हो जाएगा|
 यह एप्लीकेशन लेकर कल तू सचिव साहब के पास चले जाना वह इसका एक एस्टीमेट बना देंगे और सरपंच साहब के साइन से पैसा पास हो जाएगा|
छगन बहुत खुश हो गया और अपने वार्ड पंच को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया 
अगले दिन तड़के ही छगन सचिव साहब के घर चला गया |
सचिव साहब ने एप्लीकेशन देखते ही छगन को बोला -छगन भाई टंकी निर्माण का काम तो पूरे खत्म हो चुके है अब तो अगले साल में ही आपकी ये टंकी बन पाएगी|
छगन की आशा पूरी टूट गई,  दुखी  मन से- सचिव जी कुछ हो नहीं सकता टंकी तो अभी बनानी है|
देख भाई छगन काम हो तो सकता है  कुछ खर्चा करना पड़ेगा, ₹500 लगेंगे|
छगन ने सोचा कि बच्चे एक बार बीमार होते हैं तो हजार डेढ़ हजार ऐसे ही खर्च हो जाते हैं तो इनको ₹500 देने पर भी फायदा ही है और उसने हां कर दी|
सचिव ने ₹9000 का एक एस्टीमेट बनाकर छगन को थमा दिया और बोला कि सरपंच साहब के साइन करा कर इसको पंचायत समिति में दे देना|
अगले दिन छगन सरपंच  के पास पहुंचा, सरपंच साहब ने जाते ही उस एस्टीमेट पर साइन कर दिए और छगन ने सारे कागजात पंचायत समिति में जमा करा दिए|
करीब 1 महीने बाद एक बूढ़ा मजदुर अपने हाथ में एक कुदाली लेकर छगन को ढूंढता हुआ गांव में आया|
और छगन के बताए हुए जगह पर गड्ढा खोदने लगा,   3x3 का गड्ढा खोदने में पूरे 8 घंटे के लिए,  और शाम तक गड्ढा तैयार हो गया|
जाते हुए मजदूर बोला इसमें कनेक्शन तभी करना जब इसका का ढक्कन आ जाए|
10 दिन तक इंतजार करने के बाद भी जब कोई चुनाई करने वाला और ढक्कन लगाने वाला नहीं आया तो छगन फिर से सरपंच साहब के पास गया|
सरपंच साहब ने इस बार भी उसको सीधे सचिव के पास भेज दिया,  छगन अब परेशान हो चुका था उसने सचिव को बोला कि डेढ़ महीना हो गया, कोई भी निर्माण कार्य नहीं चल रहा हैl कब तक बनेगी टंकी? 
सचिव ने समझाते हुए,  टंकी तो बन गई बस अब उसमें ढक्कन लगाना बाकी है ,कल परसो तक लगवा देता हूं|
करीब 20 दिन बाद ट्रैक्टर ट्रॉली में बड़ा सा सीमेंट का ढक्कन लेकर कुछ मजदूर आए|
लेकिन उस ढक्कन को गड्ढे के ऊपर रखते ही गड्ढा एक तरफ से टूट गया और वह ढक्कन उस गड्ढे के अंदर ही गिर गया |
उसके बाद छगन ने बहुत दिन तक प्रयास किया बहुत बार सरपंच साहब से ,सचिव से और वार्ड पन्च से मिला लेकिन ढक्कन उस गड्ढे से बाहर नहीं निकला|
3 महीने तक भी कुछ काम नहीं होने से, छगन अपनी फरियाद लेकर पंचायत समिति पंहुचा, वहां के बड़े बाबू ने  ₹9000 की एक रसीद  और  छोटे बाबू ने पूरी बनी टंकी की एक तश्वीर दिखाई और बोला ये देखो टंकी तो बन गयी | तश्वीर में छगन का घर साफ़  रहा  था और टंकी भी पूरी बनी हुई थी |  उसके बाद वह पंचायत समिति के सभी  अफसरों  से मिला और बोला टंकी अभी भी नहीं बनी  है चाहो तो जाकर देख ले | लेकिन तश्वीर को कोई कैसे झुटला सकता है | सुबह से शाम हो गयी और उसकी बात मानने को कोई तैयार नहीं था | 
छगन इस सरकारी तंत्र से तो हार मान गया, पर टंकी तो उसको बनानी थी |  घर जाकर 2 घंटे में 2X2 का एक नया गड्डा  बना लिया और गॉव से कुछ जवान लड़को को बुला कर उसी  ढक्क्न को नए गड्डे पर रखवा लिया | 
दोस्तो आजादी के 70 साल बाद , आज भी बहुत सारी टंकियां भी सिर्फ कागजों में बनती है , ऐसे ही बहुत से छगन परेशान होते है| चंद लोगो की इस तरह की बेईमानी से मेहनतकस सरकारी कर्मचारी भी बदनाम होते  है
Read More
-*-*-*-

Dream to Fly

The phone rang while I was about to do the web check in to fly from Muscat to Kochi. 'Sir, this is a call from customer services, Airlines.'
I was little worried hearing that call was from Airlines. The lady continued her talk. 'Sir, we can upgrade you to the Business class for very little amount.' 
I had already received a email regarding the upgradation and declined the offer. The offer price was 50%  of my economy class.' 
'Sir, I am also from your place in Kerala, why don't you spent some extra money?' I got little annoyed but hid the feeling and replied to her. 
'Look sister, it is not that I can't afford that extra amount but a simple policy that we should not waste the money which may be very essential minimum survival amount for an average person.' 
There was a sound of laughte at the other side. She said. 'Sir, you are trying to avoid me with some story.' 
I said. 'No, if you have patience to listen to me I will tell a story. You may judge me after hearing the story.'
I was 8 years old and lived in a village ancestor house which had no electricity during time.
 We had to walk many Kilometres bare foot. In those days seldom we took the private bus to school which was just 10paise at that time.
Our village had a railway gate and that had helped us to get a free drop in some vehicles to the school. 
One of my relative who served in British Indian army. He asked me once. 'What do you want to become when you grew up?' 
I had no second thought and replied. 
'I want sit in a revolving chair and work under the fan.' You may wonder 'Is it s dream?'.
Yes, it was a dream that time. Years passed, I had finished my 10th grade in Kerala and moved to Bangalore along with my father. 
The difficulties was part of the education period.  Dad got me a carpenter made Drawing board and T-Square.
I got my first job in BPL group and later joined TVS group. My career took a major turn with the CAD/CAE training I received from there. 
Years passed and I landed up in the Oil rich Gulf and grew financially. I did not only stop just growing in my career but also continued my passion of writing stories.
I crossed the hurdles with mere hardwork and my dedication. 
I pursued my dream and tried my hands at many things and achieved few things in my life.
I do not wish to forget my hard day's.
I made a full stop to the talk and asked her. 'Are you still with me dear?' 
She replied. 'Yes sir, we are hounored to fly you in our flight.'. I relpied, 'Thank you very much.' 
She said, 'We are upgrading you free , from now onwards you are our special guest.'
I replied. 'Thank you.'

By Rajan V Kokkuri
Instagram id: rajan_vkokkuri
Author 3 Published books by name
I Remain Forever Yours
My Precious Dreams
Mere Anmol Sapne
Read More
-*-*-*-

सुख या दुख

दो बेटों की अम्मा सुखी थी या दुखी, उसको खुद भी समझ नहीं आ रहा था I बड़ा बेटा  सुरेश जो अपने घर बिजवासन हरियाणा से बहुत दूर हैदराबाद में जाकर अपना बिजनेस जमाया था I साल में एक बार ही  घर आ रहा था उसके बच्चे बड़े तो हो रहे थे लेकिन इस दादी को कभी दुलार का मौका भी नहीं मिला था I
छोटा बेटा रमेश जो कि घर से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर एक कंपनी में मैनेजर थाI
 एक बेटा लाखों मैं अपने बिजनेस में कमा रहा था तो दूसरा बेटा अच्छी तनख्वाह पा रहा था I
मां इस बात से खुश थी एक बेटा तो पास ही रहता है लेकिन तभी उस बेटे का भी प्रमोशन के साथ तबादला हो गया, उसके तबादले की खबर सबको थी लेकिन उसने अपनी मां को नहीं बताया I 
सोचा घर जाकर पहले कुछ समझा लूंगा फिर खुद ही बताऊंगा I
 लेकिन समझाने को भी तो कुछ नहीं था वह कुछ भी कहे पर वह दूर तो जा रहा था और अपनी मां को कैसे झुठला सकता था I 
छुट्टी लेकर वह पहुंच गया अपनी मां के पास और मां को बोला- मां तू मेरे साथ चल I 
मां बोली- तू 50 किलोमीटर तो दूर रहता है हर हफ्ते घर आ जाता है मैं तेरे साथ चल कर क्या करूंगी I
लेकिन फिर रमेश बोला - नहीं मां, तू चल मेरे साथ I
मां बोली- बेटा, क्या हो गया तुझे , क्यों बहकी बहकी बात कर रहा हैI
 इतनी सी दूर के लिए क्यों मैं अपना घर छोड़ दूं I मुझे अपने इस घर से बहुत प्यार है, इसमें मेरे दो बेटों ने जन्म लिया है उनकी किलकारियां अभी भी इस घर में  सुनाई देती है, मैं  इस घर को को छोड़ नहीं सकती हूं I
यह सब बात सुनकर रमेश की आंखों से अश्रु धारा बहने लगी और मां को बोला,  मां मेरा तबादला चित्तौड़गढ़ राजस्थान में हो गया है I
मां - अब तो कितने दिन में आएगा I
रमेश - 500 किलोमीटर है , लेकिन 15 20 दिन में एक बार तो आ ही जाऊंगा I
इतने में सुरेश का फोन आ गया और बोला, मां मैं बस स्टैंड पर आ गया हूं I रमेश को लेने भेज दो
मेरे तबादले का दुख कुछ देर के लिए टल गया और मैं भैया को लेने चला गया  I
Read More
-*-*-*-

बत्तीस दिन के बाद जीवन फिर मुस्काया

21अक्तूबर 2020 की शाम से ही बुखार और खांसी थी। इसलिए 22अक्तूबर को ऑफिस नहीं गया। बेटी अर्चना ने मुझे कोरोना का टेस्ट कराने की सलाह दी। मैंने यह कह कर टाल दिया कि सामान्य मौसमीय बदलाव के कारण ऐसा हो रहा है। किन्तु उसने पूना से ही घर टेस्ट  कराने के लिए  लैब  बुक करा दिया। अगले दिन टेस्ट कोरोना  पॉजिटिव  आ गया। चिन्ता अपने साथ साथ परिवारजनों की भी हुई। डॉक्टर ने सत्रह दिन का होम आइसोलेशन लिख दिया और हम अपने बेडरूम में कैद हो गए। यह एक बड़ी त्रासदी होती है जब आपको अपनो से अलग कर दिया जाय। मित्र डॉक्टर आर. के. जैन को फोन किया तो उन्होंने पूरी सांत्वना दी। बिल्कुल नहीं घबराने की सलाह दी। एक पल्स – ऑक्सीमीटर और थर्मामीटर खरीदने का विशेष आग्रह किया जिससे बुखार और शरीर में ऑक्सीजन लेवल नापा जा सके। इसके साथ घर के सभी सदस्यों का भी टेस्ट कराने का सुझाव दिया। दो दिन बाद टेस्ट कराए सभी के टेस्ट पॉजिटिव आए बेटे को छोड़कर। सभी आइसोलेट हो गए। कौन खाना बनाए ,कौन और घर का काम करे? बड़ा संकट आ गया।उधर  दिन में तीन बार 650 एमजी की पैरासीटामोल खाने के बाद भी  बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था। ईश्वर की कृपा से ऑक्सीजन लेवल ठीक रहा।  इस कारण अपने जन्मदिन पर मिली बधाईयों का उत्तर भी न दे सका।  पत्नी, जो अभी तक ठीक थी, उस  पर  कोविड़ ने कहर  ढाणा शुरू कर दिया। उन्हें बुखार के साथ साथ खांसी और जोड़ों में दर्द शुरू हो गया। 3 नवम्बर को उनका ऑक्सीजन सेचुरेशन लेवल 88% हो गया। जबर्दस्त घबराहट हो गई। तुरंत 102 पर एम्बुलेंस कॉल की गई। उसे आने में एक घंटा लगा। वाइफ को तुरंत बेटे के साथ  सेंट्रल हॉस्पिटल भेजा। मेरे लिए यह बहुत भावुक पल था कि मैं इस समय पत्नी के साथ नहीं जा पा रहा था। मेरी नातिन ने मेरी आंखों के पहचान लिए और कहने लगी नाना जी आप नानी को लेकर परेशान हो न ? फिर मुझे सांत्वना दी नानी ठीक होकर आ जायेगी। चिन्ता न करो। मैं शायद दूसरों के सामने खुद को कमजोर नहीं दिखाना चाहता था। मेरी आंखें बेडरूम की खिड़की से एंबुलेन्स निकलने तक वाइफ को देखती रही। मैं उस समय कितना अवश और विवश था,बता नहीं सकता। जीवन में पहली बार ऐसा हो रहा था कि सुख-दुख में मेरे साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़ी रहने वाली पत्नी  को इस समय जब मेरी सबसे अधिक जरूरत थी, मैं साथ नहीं था। रेलवे हॉस्पिटल में भर्ती के दो दिन बाद 5 नवम्बर को उन्हें आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया। सात नवम्बर को मेरा होम आइसोलेशन समाप्त हो गया। उसी  रात आईसीयू में कई कोविड  रोगियों के स्वर्ग सिधारे तो वह बुरी तरह से घबरा गई। हम लोग अस्पताल से 30किमी दूर थे और बेटे भी कोराना पॉजिटिव हो गया। अस्पताल में जा नहीं सकते। पत्नी बार बार कह रही थी कि मुझे बहुत घबराहट हो रही है, यहां से ले जाओ। छोटी बेटी रजनी ने फिर मोर्चा संभाला। वो रात के बारह बजे गुडग़ांव से आईसीयू के सामने आई और फोन पर कहा "' मां,घबराओ नहीं , मैं यहीं बाहर बैठी हूं। तब जाकर उसे शांति मिली। लगभग एक  सप्ताह के कोविड के उपचार के बाद आईसीयू  में रहने से स्थिति  सुधर गई और उन्हें वापस कोरोना आइसोलेशन वार्ड में भेज दिया। हम और पुत्र दोनों ठीक हो गए थे। रोज डाक्टर से हाल लेने रेलवे अस्पताल जाते रहे और ईश्वर से उसके  ठीक होने की प्रार्थना करते रहे। भाई और बहन , बेटियां और समधी और समधन के अतिरिक्त सहयोगी और मित्र शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए दुआ करते रहें। मित्र अनूप श्रीवास्तव तो रोज सुबह फोन कर हाल चाल लेते और सांत्वना देते रहे। मेरे डीएमआरसी के पूर्व सहयोगी आ. नीरा खुंटिया, श्वेता वर्मा,संतोष भारती, निखिल आनंद गिरि, अस्मिका सिन्हा,kashiram तथा मित्र डॉ पुष्पा  जोशी, भारत भूषण शर्मा ,सुभाष चंदर, स्नेहलता पाठक,अरुण अर्णव खरे, राजशेखर चौबे, डॉ. रमा द्विवेदी,डॉ आभा सिंह, सुधा मिश्रा, कीर्ति काले,प्रमिला पाण्डेय, राजेश सिंह,डॉ सविता   सौरभ ,आलोक चतुर्वेदी , ओम प्रकाश शुक्ल, डा. पवन विजय, सुरेशपाल वर्मा जसाला, श्री एस के बंसल, एम के बंसल, वसुधा कनुप्रिया ,विजय प्रशांत सहित अनेक मित्र निरंतर फोन पर ढांढस बढ़ाते रहे। आखिर सभी की प्रार्थना को ईश्वर ने सुन लिया और पत्नी बत्तीस दिन के बाद कोरोनावायरस से जंग जीतकर 4 दिसंबर 2020 को हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर घर आ गई। अब स्वस्थ है किन्तु काफी कमजोर हो गई है। कोरोना के संक्रामक रोग होने के कारण उस  वार्ड में कोई निकट सम्बन्धी नहीं जा सकता था। यह एक तरह से स्वास्थ्य कारागार है जो स्वस्थ होने के लिए आवश्यक है। कई बार जब अस्पताल जाते तो PPE किट में बंद दिवंगत आत्माओं को देखकर मन घबरा जाता और अनेक आशंकाए मन को घेर लेती लेकिन हमारे सामने कोई  विकल्प तो था नहीं। पत्नी ने लौटकर कई घटनाएं बताई। सब ईश्वर का खेल है। कोविड रोगियों को बचाने में डाक्टर,नर्स,पैरामेडिकल स्टाफ,सफाई कर्मचारी अपनी जान की बाजी लगाए हुए हैं। मैं उन सभी का रेलवे अस्पताल कर्मचारियों और डॉक्टर्स का धन्यवाद करता हूं जिन्होंने मेरी पत्नी का उचित उपचार कर नया जीवन दिया। जीवन के ये बत्तीस दिन मेरे लिए अविस्मरणीय बन गए हैं। अपने सभी सगे संबंधियों और मित्रों का आभार व्यक्त करना चाहता हूं जिन्होंने इस संकटकाल में मेरा हौसला बढ़ाया और कभी कमजोर नहीं होने दिया। अंत में मैं उस जीवनदाता ईश्वर का धन्यवाद व्यक्त करना चाहता हूं जिसने पत्नी को एक और जीवन दिया। मैं ईश्वर से विश्व के  सभी कोरोनाग्रस्त रोगियों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना भी करता हूं। 

एक सलाह : कृपया कोविड भी लक्षण दिखे तो टेस्ट जरूर कराएं और सरकारी आदेशों का पालन करें । यह हमारे अपने और स्वजनों के हित में है।
Read More
-*-*-*-

MY SECOND MISTAKE

It was in the year 2000 when I was working in NTPC Dadri that I decided to construct my own house in Ghaziabad. I searched for a good location for my house where connectivity, education and medical facilities with good transportation were available. I built and completed my house in 2001 but since I was living in NTPC Township, I decided to let the house on rent. I informed several agencies about my wish to rent the house. 
One day a senior person, about 60 years of age, came to me and told me that he wanted to rent the house. He told me about his service background and family conditions. One of his friends was my colleague.  Considering his age and family problems, I accepted his request.  This was my second mistake. Without properly verifying him and his intentions, I gave him the keys to my place. I signed an agreement of tenancy with him.
For the first two years or so he was regular with the rent payments but during the third year he started to delay. Though my suspicions were aroused, I continued to let him rent the place. But in fourth year he became arrogant .He did not pay the rent on time and continued to delay.
With the help of my friends I tried to convince him but he was rigid. He would not pay the rent nor would he vacate the house.  I also tried to take help from my colleague who was his friend. But he also refused to help. Then I tried to get his relatives to help me but they all denied help. I requested DM SP and local police. I could not get help from anywhere.
They told me that they had no right to force him to vacate the house. They could only try to convince him. They asked him to vacate at the earliest and the tenant agreed to vacate within 15 days.
I became relaxed and waited for him to vacate the house. But after one week I was surprised to see the court notice he had send. In the notice he charged me along with 4 policemen for his harassment. I contacted a lawyer to help me with the case.
 I filed a reply to the notice in a Civil Court. The case dragged on for two years without any real progress. I was getting dates after dates.  Three years had passed and the judgement came in favour of the tenant.  I had no option but to file an eviction suit in upper Civil Court. I asked the sitting judge to guide me. Being an NTPC employee he told me to hire a senior lawyer.  Without wasting any time I met with a lawyer, but he was costly. I had no other option. I could not let a stranger wrongfully snatch away my hard earned house only due to a court case. So I decided to hire that lawyer and he started gathering information for my case. 
This lawyer worked hard for me. He filed an eviction suit in the upper Civil Court. After a few days my tenant started depositing the balance rent amount of two and half years in the court. I felt a ray of hope. I would succeed. Later I came to know that my first lawyer had conspired with my tenant to cheat me.  At the end of third year, my tenant was on back foot and it seemed that I could win the case. I continued to pray god 
Ultimately in the fourth year before the final hearing, he became agreeable to a compromise. He was ready to pay the pending rent and electricity bills. After one month he called me at my home and gave me the keys to my house. I prayed to God a lot thanking him for ending my struggle of four years. 
Proper Enquiry of records is must for a tenant.
Read More
-*-*-*-

Dark Practices: Still Exist

Nature attracts everyone & so do me and I want to get wet again and again by nature's love. I always love & wait for the rainy season to come throughout year...
One rainy day, while enjoying the rain, I was standing in the balcony with a cup of tea in my hand & suddenly my eyes stopped at the vegetable shop of the society just opposite to my landlord’s house. I saw society cleaner cleaning and collecting the society garbage in his cart, but my eyes got stuck in the cart, where his 5yrs old son was sitting aside, he was properly dressed and waiting for his father in the cart, and in the same frame I saw  a young professional father carrying his little girl, they stopped at the society’s gate waiting for her school bus. That scene made me realized father love is eternal, no matter what your profession is, rich or poor you are, that fatherly love is same everywhere. I got so mesmerized by that view that I didn’t even realize when my tea mug stood empty & I was just standing, thinking, joining dots of my own thoughts.
Few hours later, I saw Rajkumari didi(my maid), entered my room and said, Sorry didi, I got late due to rain.
Me: No worry, Didi. I understand your issue, its rainy season. You can come any time
Rajkumari: Thank you didi, you are very supportive.
Time flies, in my new job and new city
One morning, I was as usual getting ready for my college, suddenly Didi came in my room, from her gestures I assume than she was not  feeling well.
Me: Didi, all well ?
Didi: I am fine and I have to be fine or else how will I be able to work?
Me: No Didi, it’s not like that, your body is also made of flesh & bones. You don’t need to come to my home for work when you are sick, and  I will never deduct single penny from your salary.
Didi: You think so, but everybody does not think so.
And as soon as she said so, Didi started crying heavily. I tried to console her, but she kept crying, then I gave her a glass of water and said, “drink water and tell me what happened”.
Didi: Rajkumari Didi got emotional and said, working in the house of the people is my helplessness and my source of income too, but at the end I am also human and woman too. God have created all human beings. 
Me: Yes didi, I understand you & life struggles of a woman.
Didi: Like every woman, I too face a mensuration cycle every month and its natural for every woman.
You know before coming to your home, I do the cleaning job of aunty’s place(landowner). Today is the second day of my mensuration cycle and for this reason and I am not  feeling well. Though I am not well still I attended my daily work schedule. As, I was  doing my cleaning job, I have a sudden stomach ache. Could not go to the washroom which mainly used by the cleaning staff, So, without  thinking much I used the owner’s washroom, once I open the gate of the washroom, mistress  screamed with a loud voice “ How dare you use to our washroom, that too in your mensuration period” 
Me: Why? She screamed on you?
Didi: I belong from the slum areas, that is the reason.
Me: Didi, but you clean their house and wash their cooking utensils too. How can people be so inhuman. 
Me: Didi, I am sorry I was not aware of such “washroom discrimination rituals”, you are always welcome to use my washroom in any moments of time, and you don’t have to come when in your first two days of your mensuration periods.
Didi: Thank you, you think like that, but people do not have the same thoughts. A house like a splendid palace, branded cars in front of the house, people are highly educated but thoughts did not change, still holding the discrimination thoughts.
Me: Do not worry Didi, all will be fine. I am getting late for college. Please take care.
Few hours later, I reached college, sitting on my work station I was thinking about the episode, which was share by Rajkumari Didi..
Every day I read about discrimination in the name of caste and racial discrimination, but never thought never thought about washroom discrimination that exist in our society. 
This episode might sound common, but I can’t accept these practices around me & living with these suffocates me. At the end some things can’t be changed completely the way you want. You can’t change world, can’t change society, can’t change people, the only thing you can change is YOU, by accepting every situation & people as they are. My thoughts are still scattered like stars, can’t make constellations out of these.
Read More
-*-*-*-

The Beauty of Failure

My Journey of an ordinary girl to become an Author: Failure is the assets of life. 

Failures and success are two interconnected phenomena that characterize human life. I (Sukanya Roy) am successful failure, I failed in every venture of my life and that helps me to learn more and explore my life in a meaning way.  I still remember my childhood instance, when I was in 8th std and secured low scores in computer subject, I was bit scared to show my marks to  maa, but her reaction regarding my marks was little different , she neither scold or make negative remarks on my  computer marks,  in fact she hold my hands and   told  “next time prepared well and try to learn the concept more and If you try and failed again, we will celebrate because  your learning helps you in future not your scores”   That small instance change my perspective towards failure till today  when I failed, I don’t take the pain rather  I enjoy the failed moments which provides a  rich  experience and that experience  helps me to gain more knowledge and knowledge make you  better person.
Today I want to share the failure framework which I learned from my life experience.
Read More
-*-*-*-

सपने

आज घर की रसोई मे पकवानों की भीनी भीनी महक आ रही थी ! दरअसल आज मेरा' नीट ' का परीक्षा परिणाम आना था और मम्मी मेरी सफलता के प्रति पूर्णतया आश्वस्त थी ! इसलिए पड़ोसियो को पार्टी देने की पूरी तैयारी थी !
मग़र मेरे दिल मे उथल पुथल मची हुई थी !

तभी घर की डोरबेल कोयल सी चहकी !
" अन्नू ..देखो तो जरा.. दरवाजे पर कौन है "? मम्मी ने रसोई से आवाज लगाई !
मैने दोड़कर दरवाजा खोला तो पापा खड़े थे ! उनके हाथ मे मेरा रिजल्ट कार्ड था !
रिजल्ट कार्ड देखकर मेरा दिल धड़कने लगा !
लो तुम्हारी लाडली अबकी बार भी 10 मार्क्स से रह गई ! पापा ने घर मे घुसते हुए मम्मी को ताना मारते हुए कहा !

हाय ! इस लड़की ने तो हमारी ईज्जत धूल मे मिला दी ! पड़ोसियों  के आगे अब कौनसा मुँह लेकर निकलेंगे !
दो वर्ष मे  पाँच लाख रूपये इसकी कोंचिंग पर खर्च कर दिए मग़र नतिजा वही ढाक के तीने पात ! सारे दिन इसको डांस से फूर्सत मिले तब ना ! मम्मी ने अपने सारे सपनों के बोझ की गठड़ी मेरे सिर पर लाद दी थी !

मै कहना चाहती थी ,मम्मी मुझे डाक्टरी नही ,नृत्य पंसद है ! मैने राज्य स्तर पर नृत्य मे प्रथम स्थान प्राप्त किया है !अपने सपने मेरे ऊपर मत थोपो ! मुझे मेरे सपने पुरे करने दो!

मग़र हाय रे संस्कार !तुम्हारे  जबान पर लगाए हुए तालों के कारण मेरे शब्द कण्ठ मे ही फड़फड़ा कर दम तोड़ चूके थे !
Read More
-*-*-*-

Embrace Failure

It was a rainy evening and I was enjoying a cup of coffee with hot samosas. A soothing Rabindra sangeet truly made my evening. I truly believe in celebrating myself.
While I was enjoying my coffee, suddenly the bell rang. After switching off the music, I moved towards the door.
“Who’s there?”
A male voice: “Open Sukanya, Dharmik here.”
Me: “Ohh great! What a pleasant surprise! No prior notice and you visit my place, suddenly.”
Dharmik: “Yeah, to give a surprise.”
Me: “Great! Let’s enjoy coffee and samosas.”
On hearing the evening snacks menu, Dharmik was super excited and started doing his favourite salsa steps. As he was engaged with his salsa, I went to the kitchen to fry more samosas and to make another cup of coffee.
Samosas were served with green chutney to Dharmik.
I served the hot samosas in his favourite plate; he grabbed them and took a bite with green chutney without wasting a second. His indulging expression can't be expressed in words. From here, our never-ending food chat started.
We knew each other but he never visited me without prior notice. This was making me puzzled and to get the answer, I finally asked, “Is everything okay with you?”
Dharmik: “Yeah, but today I feel low.”
Me: “(My eyes popped out) seriously Dharmik, I never saw you in a low mood!”
Dharmik: “Yeah, I am also human, I have emotions too”
Me: “Why? What Happened? Please, open your heart.”
Before starting the conversation, we picked samosas to start the discussion with some hot relishes.
Dharmik: “Sometimes I wonder, what is the purpose of life? I have a wonderful career graph, worked with all big brands and now, I joined the topmost educational institute ‘Global Educational Institute/GEI’ institute to explore the academic world, learn lots of frameworks. I am, now, aware of what I will do after this.”
Me: “Dharmik, no worry. Everyone has their own successful graph, in terms of professional and personal life. But one thing you know Dharmik! I have gone through a successful failure, in every aspect of my life, either professional or personal.”
I added more details to elicit the discussion,
“In my entire family generation, I was the only girl whose marriage sustained for only three months. My marriage was not fruitful. But after this incident, I realized the importance of me and my existence. Marriage is not the only relation. Other than human relations, I have a relation with Mother Nature and animals too.
Similarly, my professional life is not too great. In my school days, I was an average student, so not attained great scores or neither my surname includes the name of Ambani and Birla. So, I had to continue my studies at an average college. Though my course structure didn’t meet with the great education system, I learned the most important skills i.e Basic human skills (where I learned to give respect and learned a positive attitude towards life).
The second incident took place when I was preparing for government jobs. That too was a big failure for me as I attempted many exams but, fortunately, or unfortunately, didn’t get selected in any of the govt jobs, even in the Railway peon entrance exam. But today, I understood, God has some bigger plans for me. If I was selected in any govt jobs my life would be stagnant. There would be no scope to learn or explore new things from my environment. Additionally, I would not be able to understand the ground reality and problems of my small area. In those periods, I was in Jhunjhunu, where I learned the basic aptitude skills, which further helped me to open a small coaching institute, especially for women. These provided a good platform, where women can get a safe and peaceful environment to study. Vedanta coaching institute: A platform guide & mentor for Commerce/Business students. Apart from running my own institute, I also taught students of Business.
Administration at the prestigious Goenka Degree College.”
Took a deep breath and added,“Again something happened. ‘Vedanta’ failed as a startup. The competition was tough. There were several other coaching institutions in the locality, all catering to the same market. What was really my competitive advantage and how would I market that?
Failure of my startup and introspection into the cause of failure, made me realize that I did not have enough knowledge in marketing strategy and promotion skills where I can deliver my service to the target segment. In my desperation to find the answers, I joined the Global Institute of Management, Udaipur as a Research Associate to delve deeper into the Marketing Area and found out the unique ways to solve the marketing problems. GIM, Udaipur was a whole new world, where I have developed an aptitude for problem-solving through research and analysis. I worked on data construction using both primary and secondary data. Meanwhile, the theoretical and empirical challenges, I faced while working, gave me an opportunity to learn new concepts and research methodologies. In the process of working on various research papers, I underwent an extensive reading of marketing journals like ‘Journal of Marketing’, ‘Journal of Consumer Research’, ‘Journal of consumer psychology’, ‘Journal of Marketing research’, for gaining
knowledge in statistical software such as SPSS, MEXL, and R and working on marketing databases such as Sales data. Here, I fixed my mind to go for higher studies and enroll in the doctoral program from any IIMs/IITs.
Preparing for doctoral programs was a new journey for me…To enroll in any full-time Ph.D. program; I had to polish my marketing concepts. So, I landed in the class of MBA and learn more about the research tools… Though it was not the end, I have to give the GRE exam and in addition, I must gather a Letter of recommendation from professors. Till today, I don’t find any correlation GRE with doctoral programs. In my entire doctoral entrance journey, I published a paper, attended conferences, reviewed papers in some good journals and also cleared my GRE exam. Though I did not get enrolled in any Ph.D. programs, in the name of Ph.D., I learned many things.”
Dharmik (Surprised): “OMG!!!”
Me: “(replied with the smile) you know Dharmik I am blessed … My almighty brought me on the right track for my life... I got to know the most relevant answers to life in the entire admission journey for my doctoral programs; the existence of my life is to serve good works for nature. I started a dog shelter; though I would not earn good money or I will lead a fanciful life neither people will know me regarding my research work. But I am contented with my work. When I see the wagging tails of my dogs, it gives me an inner satisfaction.”
Me: “So, I embraced my failure …My failure has given me a U-turn in my life. I’m cherishing every moment of life by keeping the good works ahead. If something good happens, it’s good. If it gets failed, keep working hard. It will never fade and will definitely shine at some specific time.”
Dharmik: “True… from today onwards, I’ll embrace and celebrate every failure.”
Me: “Listen Dharmik, it is dinner time, please join for dinner.”
Dharmik: “Cool, but please prepare simple food i.e dal and rice.”
I went to the kitchen and started preparing Dharmik’s favourite dish Dal and rice, and suddenly my phone rang, it was ‘Sanya’…
Me: “Hey Sanya, How are you and where are you?”
Sanya: “On my way to Mohali, feeling hungry”
Me: “Great, Dharmik is here in my room and would you like to join us for dinner.”
Sanya: “Sounds cool.”
While disconnecting the call, I moved to Dharmik and said, “Sanya is on her way to Mohali and will join us soon for dinner.”
Suddenly the doorbell rang... Sanya was there…
Wow, it was a beautiful evening with three of us. Though we had simple food “rice and dal”, we celebrated the togetherness.
I am blessed to have such wonderful friends in my life.
Sanya and Dharmik. Love you!
Read More
-*-*-*-