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  पिता की जंग  

  Dheer         2021-02-24 13:06:00

खर्चा बहुत ज्यादा था और दुकान जवाब दे रही थी | जिस दुकान पर रोज ₹2000 की बचत होती थी,  वह दुकान  अब ₹200 की बचत भी नहीं दे पा रही थी |  बड़ी कंपनियां हमेशा छोटे दुकानदारों का नुकसान तो करती ही है,  पर एक सब्जी वाले का घर इस तरह से मदर डेयरी बर्बाद कर देगी यह सब्जी वाले ने सोचा नहीं होगा | 
 जब दो बेटे इंजीनियरिंग कर रहे हो और उस समय दुकान भी बंद हो जाए तब उस पिता पर क्या बीत रही होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है | घर का खर्च कैसे चल रहा था, और इंजीनियरिंग की फीस के पैसे कैसे भेजे जा  रहे थे यह वह पिता ही जानता था |  लेकिन इस पिता ने मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति में भी कभी हार नहीं मानी,  वह आज इस मदर डेरी से कैसे हार मान सकता था ,  और इस हार पर तो उसके बच्चों का पूरा भविष्य टिका हुआ था  | 
क्या सही है और क्या गलत  ! यह सोचे बिना , यह सब्जी वाला अपनी 25 साल पुरानी रेडी से एक पक्की दुकान वाले मदर डेयरी से कंपटीशन करने चल पड़ा | 

वह रोज सुबह जाकर मदर डेयरी के बोर्ड पर लिखे हुए भाव पढ़कर तो आता था, लेकिन वह खुद तो मंडी से भी इतना सस्ता सामान नहीं ला पा रहा था | 
अब उसके पास एक ही रास्ता बचा था ,वह था, आजादपुर मंडी से सब्जियाँ लाना |
55 साल की उम्र में वह मंडी जो कि 40 किलोमीटर दूर थी, जाना बहुत मुश्किल तो था, लेकिन विडंबना यह थी कि नहीं जाने से, मदर डेयरी के भाव पर सब्जी बेचना लगभग असंभव था | 

एक पिता ने 10 साल पहले छोड़ चुके अपने काम को फिर से शुरू किया , रात में 11:00 बजे सोने के बावजूद 2:00 बजे वापस उठकर आजादपुर मंडी जाने लगा |  अपने 25 साल के तजुर्बे का पूरा फायदा उठाया और कुछ ही  दिन में वह मदर डेयरी से सस्ते भाव में सब्जियां बेचने लगा | 

1 महीने की कमाई उसने वापस उसी दुकान में लगाई और नया इलेक्ट्रॉनिक कांटा खरीदा, एक मोबाइल खरीदा और पंपलेट भी छपवाए | 

फ्री होम डिलीवरी के साथ एक नई शुरुआत की और देखते ही देखते 1 दिन की बिक्री  7000 पर पहुंच गयी | लेकिन तभी मदर डेरी वाले एक नया दांव खेला और रेट बिल्कुल कम कर दिए | 
वह रेट तो कम कर सकता था लेकिन 25 साल का तजुर्बा कहां से लाता,  मदर डेरी वाला  बंसी सब्जी वाले  जैसी  क्वालिटी नहीं दे पाया  और धीरे-धीरे बंसी सब्जी वाले की दुकान ने रफ्तार पकड़ना शुरू किया और लोग लाइन में लगकर सब्जी खरीदने लगे सिर्फ 6 महीने की मेहनत में ही उस सब्जी वाले ने अपनी जंग जीत ली मदर डेयरी वाले ने अपनी दुकान वहां से ले जाकर दूसरी जगह लगा दी| 

हम अक्सर एक छोटी छोटी परेशानी से डर कर भाग जाते हैं और प्रयास करना ही छोड़ देते हैं बिना लड़े ही हार जाते हैं पर क्या बंसी बिना लड़े हार जाता तो अपनी दुकान को कभी चला पाता क्या ? उसके बेटे इंजीनियर बन पाते ?

यह कहानी विद्यार्थियों के लिए ऐसे कई सवाल छोड़ जाती है | 
क्या हम अपनी पूरी मेहनत कर रहे हैं ? क्या हम अपने लक्ष्य पाने की चेष्टा पूरी तरह से कर रहे हैं ?क्या हम कोई बहाना तो नहीं बना रहे ? क्या हम खुद को धोखा नहीं दे रहे?

इन सभी सवालों के जवाब यदि हम सच्चे मन से खुद को दें तो हमें सफल होने से कोई रोक नहीं सकता है........ 

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