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  कागजी टंकी  

  Dheer         2021-02-13 02:27:30

सरपंच साहब ! ओ..... सरपंच साहब! 
छगन सरपंच साहब के बड़े से मकान के बाहर खड़ा होकर आवाज लगा रहा था कई बार आवाज लगाने के बाद ऊपर बालकनी से एक जवाब मिला, 
"सरपंच साहब तो नहीं है, 2 दिन से कहीं गए हुए हैं,सोमवार को आएंगे तब आना|"
सोमवार को जब  छगन सरपंच के घर पहुचा तब सरपंच साहब बाहर चबूतरे पर बैठकर हुक्का पी रहे थे l

आओ भाई छगन, कैसे आना हुआ - सरपंच ने हुक्के का एक कश पीते हुए कहा |

सरपंच साहब मैं 3 दिन पहले भी आया था, तब सरपंचानी जी ने बोला कि आप कहीं गए हुए हैं|

अरे मैं अपनी बेटी के यहां गया था, समधी जी की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी, कल शाम को ही आया हूं|

 यह सब छोड़ो...तुम बताओ, कैसे आना हुआ, सरपंच में हुक्का छगन के हाथ में पकड़ आते हुए कहा|

साहब मेरे घर के पास जो हैंडपंप है ना, उसका पानी ऐसे ही बहता रहता है और मेरे घर के सामने आकर भर जाता है, उसमें बहुत बदबू  आती है और खूब सारे मच्छर भी हो रखे हैं|

समस्या तो तुम्हारी जायज है,  बताओ मैं कैसे सहायता कर सकता हूं , तुम ही बताओ क्या करवाना है  मैं तो तुम्हारी सेवा के लिए ही हूं | जो बोलोगे, करवा दूंगा|

एक गड्ढा करवा दीजिए ,ढकवा दीजिए, पानी सारा उसी में चला जाएगा|

ठीक है छगन करवा देते हैं ,अपने यहां के वार्ड पंच से एक एप्लीकेशन लिखवा कर ले आओ|

अगले दिन सुबह उठते ही छगन वार्ड पंच के यहां पहुंच गया, 
वार्ड पंच ने मौके का मुआयना किया और एक एप्लीकेशन लिखा | उसने लिखा कि यहां पर एक पक्की टंकी की जरूरत है जो नीचे से खुली होगी  जिससे पानी रिस कर नीचे चला जाएगा |

छगन को बोला- छगन यहां पर पक्की टंकी बनाते हैं, कच्ची टंकी तो बहुत जल्दी टूट जाएगी|

पर देख सरकारी काम है थोड़ा टाइम लगेगा, पर हो जाएगा|
 यह एप्लीकेशन लेकर कल तू सचिव साहब के पास चले जाना वह इसका एक एस्टीमेट बना देंगे और सरपंच साहब के साइन से पैसा पास हो जाएगा|
छगन बहुत खुश हो गया और अपने वार्ड पंच को बहुत-बहुत धन्यवाद दिया 
अगले दिन तड़के ही छगन सचिव साहब के घर चला गया |
सचिव साहब ने एप्लीकेशन देखते ही छगन को बोला -छगन भाई टंकी निर्माण का काम तो पूरे खत्म हो चुके है अब तो अगले साल में ही आपकी ये टंकी बन पाएगी|
छगन की आशा पूरी टूट गई,  दुखी  मन से- सचिव जी कुछ हो नहीं सकता टंकी तो अभी बनानी है|
देख भाई छगन काम हो तो सकता है  कुछ खर्चा करना पड़ेगा, ₹500 लगेंगे|
छगन ने सोचा कि बच्चे एक बार बीमार होते हैं तो हजार डेढ़ हजार ऐसे ही खर्च हो जाते हैं तो इनको ₹500 देने पर भी फायदा ही है और उसने हां कर दी|
सचिव ने ₹9000 का एक एस्टीमेट बनाकर छगन को थमा दिया और बोला कि सरपंच साहब के साइन करा कर इसको पंचायत समिति में दे देना|
अगले दिन छगन सरपंच  के पास पहुंचा, सरपंच साहब ने जाते ही उस एस्टीमेट पर साइन कर दिए और छगन ने सारे कागजात पंचायत समिति में जमा करा दिए|
करीब 1 महीने बाद एक बूढ़ा मजदुर अपने हाथ में एक कुदाली लेकर छगन को ढूंढता हुआ गांव में आया|
और छगन के बताए हुए जगह पर गड्ढा खोदने लगा,   3x3 का गड्ढा खोदने में पूरे 8 घंटे के लिए,  और शाम तक गड्ढा तैयार हो गया|
जाते हुए मजदूर बोला इसमें कनेक्शन तभी करना जब इसका का ढक्कन आ जाए|
10 दिन तक इंतजार करने के बाद भी जब कोई चुनाई करने वाला और ढक्कन लगाने वाला नहीं आया तो छगन फिर से सरपंच साहब के पास गया|
सरपंच साहब ने इस बार भी उसको सीधे सचिव के पास भेज दिया,  छगन अब परेशान हो चुका था उसने सचिव को बोला कि डेढ़ महीना हो गया, कोई भी निर्माण कार्य नहीं चल रहा हैl कब तक बनेगी टंकी? 
सचिव ने समझाते हुए,  टंकी तो बन गई बस अब उसमें ढक्कन लगाना बाकी है ,कल परसो तक लगवा देता हूं|
करीब 20 दिन बाद ट्रैक्टर ट्रॉली में बड़ा सा सीमेंट का ढक्कन लेकर कुछ मजदूर आए|
लेकिन उस ढक्कन को गड्ढे के ऊपर रखते ही गड्ढा एक तरफ से टूट गया और वह ढक्कन उस गड्ढे के अंदर ही गिर गया |
उसके बाद छगन ने बहुत दिन तक प्रयास किया बहुत बार सरपंच साहब से ,सचिव से और वार्ड पन्च से मिला लेकिन ढक्कन उस गड्ढे से बाहर नहीं निकला|
3 महीने तक भी कुछ काम नहीं होने से, छगन अपनी फरियाद लेकर पंचायत समिति पंहुचा, वहां के बड़े बाबू ने  ₹9000 की एक रसीद  और  छोटे बाबू ने पूरी बनी टंकी की एक तश्वीर दिखाई और बोला ये देखो टंकी तो बन गयी | तश्वीर में छगन का घर साफ़  रहा  था और टंकी भी पूरी बनी हुई थी |  उसके बाद वह पंचायत समिति के सभी  अफसरों  से मिला और बोला टंकी अभी भी नहीं बनी  है चाहो तो जाकर देख ले | लेकिन तश्वीर को कोई कैसे झुटला सकता है | सुबह से शाम हो गयी और उसकी बात मानने को कोई तैयार नहीं था | 
छगन इस सरकारी तंत्र से तो हार मान गया, पर टंकी तो उसको बनानी थी |  घर जाकर 2 घंटे में 2X2 का एक नया गड्डा  बना लिया और गॉव से कुछ जवान लड़को को बुला कर उसी  ढक्क्न को नए गड्डे पर रखवा लिया | 
दोस्तो आजादी के 70 साल बाद , आज भी बहुत सारी टंकियां भी सिर्फ कागजों में बनती है , ऐसे ही बहुत से छगन परेशान होते है| चंद लोगो की इस तरह की बेईमानी से मेहनतकस सरकारी कर्मचारी भी बदनाम होते  है
 

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