Kaviraj Rj Yogi



Kaviraj Rj Yogi




Poetry

मानव जीवन

भरी दुपहरी को मैंने 
सुरज को ढलते देखा है
जिंदा इंसानों को भी मैंने
तिल तिल जलते देखा है

कांटों और अंगारों पर मैंने
सच को चलते देखा है
निश्चल मन में भी मैंने
भ्रम को पलते देखा है

सत्य को मौन रह मैंने
झुठ को चलते देखा है
चंद सिक्कों पर मैंने
चौले बदलते देखा है

Copyright
Kaviraj Rj yogi 
Baya-sikar 
Rajasthan
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