DIVYANSH SAXENA



DIVYANSH SAXENA

AIR 2 GATE 2014 IN ELECTRONICS AND COMMUNICATION




Poetry

घर के वृक्ष

वैसे तो पुष्प लता और वेल हर मन को हर्षाती है,
क्योंकि उनकी महक और छटा की बद्री सब जग पर छा जाती है।
किन्तु परन्तु आज इन रंगों को और अब मैं ना देखूंगा,
सब जिस पर मनमोहित है, इन सब पर आज नजर ना फैरूंगा।
आज मै सोच रहा हूं उस दरख़्त को देख कर,
जिसकी छाया के नीचे, सींचती हुआ है ये वन मनोहर।
उस विशाल वृक्ष जिसके नीचे बसी है ये बगिया,
जिसके होने से खिली है पुष्प लता और ये कलिया।
इसी वृक्ष के नीचे गुजरे है ,जहां हर एक मौसम,
हर धूप में जिसकी छाया में सब ने पाया है मरहम।
बारिशों में भी आंधियों से उसने ही बचाया था,
सर्दियों में उसके नीचे हर फूल फूल मुसकाया था।
हर कोई बगिया को देखता है, पर उस तरू को ना देख पाता है,
पर वह अपने नीचे खिले हर पुष्प को देख देख मुस्काता है।
इसलिए है वृक्ष! आज मेरा वंदन स्वीकार करे,
अपने घरों के वृक्षों से हम सब, इस तरह से प्यार करे।
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